खुफिया रिपोर्ट में मायावती और भीम आर्मी में अंदरूनी समझौते का खुलासा

Spread the love

लखनऊ-: इसी मंगलवार को सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में दलितों से मिलकर बसपा सुप्रीमो लौट, तो गयीं। लेकिन, दलितों के आंसू पौछने के समय उनकी ‘अमृतवाणी‘ अपनी असर छोडे बिना नहीं रह सकी। इसीलिये उनके वापस लौटते ही सब्बीरपुर सहित उसके आसपास का इलाका एक बार फिर हिंसा की चपेट में आ गया। तो क्या मायावती का यह दौरा इसी गरज से हुआ था? इस सवाल का जवाब कोई दे या न दे। लेकिन, मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ को सौंपी गयी रिपोट्र्र में कहा गया है कि भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद और मायावती में अंदरूनी रिश्ते रहे हैं।

इस रिपोर्ट के आधार पर एक बार फिर यह सवाल उछन जाता है कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने दलित वोटबैंक के बिखर जाने से मायावती अब इस हद तक हताश और निराश हो गयी हैं कि अपनी सियासत को एक बार फिर चमकाने के लिये उन्हें भीम आर्मी के विवादित चीफ चंद्रशेखर आजाद ‘रावण‘ जैसे व्यक्ति के साथ हाथ मिलाने की जरूरत पड गयी है? असलियत क्या है? यह तो खुफिया रिपोर्ट के पूरी तरह खुलासा होने और असकी जांच रिपोर्ट से ही पता चल सकेगा। लेकिन, प्रदेश के उप मुख्य मंत्री केशव प्रसाद मौर्य इस प्रकरण को लेकर इतना अधिक क्षुब्ध है कि दोषी पाये जाने पर किसी को भी बख्शने को तैयार नहीं हैं। चाहे वह कोई भी हो।

यह तो बाद की बात है। आज तो इस इलाके की स्थिति यह है कि दोनों ही पक्षों में जातीय हिंसा की यह आग धधक रही है। दोनों ही पक्षों के युवक यह जंग सिर्फ अपने बाहुबल पर जीत लेना चाहते हैं। उन्हें मीडिया अथवा पुलिस इन दोनों में से किसी का भी सहारा नहीं चाहिये। बदले की यही भावना इन पक्षों की महिलाओं में भी साफ नजर आ रही है। शब्बीरपुर की दलित बस्ती में रहने वाली कमला का गुस्सा आज भी सातवे आसमान पर है। इसका कहना है कि पांच मई को उन पर भी हमला किया गया था। इसमें उनका घर तक तोड दिया गया था। प्रशासनिक अधिकारी राजपूतों की तरफ है। यही कारण है कि उन्हें अब तक कोई भी मदद नहीं मिल पायी है। इसके विपरीत राजपूत बिरादरी की युवती कंचन का कहना है कि उनकी तरफ के बेकसूर युवकों को जेल भेज दिया गया है। महिलाएं अपने घरों में अकेली है। जिनके खिलाफ आये दिन अभद्र टिप्पणियां की जा रही है।

बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम पर तटस्थ पर्यवेक्षकों का कहना है कि आज से लगभग पांच महीने पहले इसी शब्बीरपुर गांव में दलित समुदाय के लोगों ने संत रविदास के मंदिर में डा0 अंबेदकर की प्रतिमा स्थापित करने का प्रयास किया था। लेकिन, इसे लेकर राजपूतों के विरोध के कारण पुलिस ने यह नहीं होने दिया था। इसके बाद अंबेदकर जयंती के अवसर पर दलितों को जुलूस निकालने की भी अनुमति नहीं दी गयी थी। इसके विपरीत इसी पांच मई को शिमलाना में राजपूतों को महाराणा प्रताप की जयंती मनाने की अनुमति दे दी गयी थी। इसका दलित समाज पर बडा प्रतिकुल असर पडा। वह प्रशासनिक पक्षपात के कारण भडक गया। नतीजतन, राजपूत यंवकों का जुलूस जब दलित बस्ती के पास पहुंचा, तो उस पर पथराव कर दिसा गया। इसके विरोध में दूसरे पक्ष ने कई दलितों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया। इसके बाद नौ मई को दलितों के प्रदर्शन को बलपूर्वक दबाने की कोशिश के विरोध में फिर हिंसात्मक उपद्रव हुआ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *