ट्रिपल इंजन के राज में, मेरा पहाड़ अब क्यों बदहाल !

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बड़ी विडंबना है उत्तराखंड के पहाड़ों की, पहाड़ों के विकास के लिए राज्य बना और पहाड़ों का ही विकास नहीं हो पाया। जी हां आपको बता रहा है बोलता उत्तराखंड। राज्य स्थापना के 17 साल बीतने के बाद आज भी कर्णप्रयाग विधानसभा के कपीरी और कडाकोट पट्टी के सैकड़ों गांवो के हजारो लोगो को मोटरमार्ग सुविधा के अभाव में 9 किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांवो तक पहुंचना पड़ रहा है । साल 2009 में इस क्षेत्र को मुख्य मार्ग से जोड़ने के लिए 3.5 किलोमीटर सड़क व 95 मीटर पुल की स्वीकृति हेतु 491.50 लाख रु0 शासन से अवमुक्त किये गए थे , जिसके बाद साल 2013 में वन भूमि से इस योजना के लिए हरी झंडी मिली थी । मगर स्वीकृति के 8 साल पूरे होने के बाद भी यह योजना अभी तक पूरी नही हो पाई , जिससे नाराज होकर क्षेत्रीय जनता ने आमसोड में सरकार के खिलाप नारेबाजी की , लोगो का कहना है कि बिभाग द्वारा पिंडर नदी पर लकडी का अस्थायी पुल बनाया गया है । जिससे इन दिनों ग्रामीण जान को जोखिम में डालकर आवाजाही कर रहे है ।

सेरागाड़ के ग्रामीणों ने बताया कि मोटर रोड न होने के कारण क्षेत्रो के पलायन दिनों दिन बढ़ता जा रहा है । इतना ही नही न तो क्षेत्र में स्वास्थ्य की सुविधा है और न ही नजदीक कोई शिक्षा की , यदि शासन के किसी कर्मचारी की नियुक्ति क्षेत्र में हो भी जाति है तो वह भी अपना तबादला कही और करवा देते है । जो कि बड़े ही चिंता का विषय भी है । सरकार पलायन को लेकर योजना कागजो में बना रही है जिससे योजनाए धरातल पर उतरने से पहले ही दम तोड़ने लगती है । लोगो ने चेतावनी दी है कि अगर मार्ग निर्माण का कार्य समय 15 दिनों के भीतर शुरू नही हुआ तो गौचर पीडब्ल्यूडी कार्यालय पर तालेबन्दी कर आंदोलन शुरू किया जाएगा । बोलता उत्तराखंड का सवाल ये है की जब गांवो में आज भी मूलभूत सुविधाओं को पहुंचाने में सरकार असर्मथ है तो पलायन आयोग का गठन करके क्या होगा ? सुविधा नहीं होंगी तो पहाड़ यूं ही ख़ाली होते चले जायेंगे। आख़िर कब तक यहां के राजनेता जनता को यूं ही झूठे आश्वासनों को देते रहेंगे ? आख़िर कब तक पहाड़ यूं ही अपनी बदहाली के आंसू बहाता रहेगा ?

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