तीन तलाक के खिलाफ जीती पहली लड़ाई, पति का फैसला अमान्य करार

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उत्तर प्रदेश के बरेली में तीन तलाक के खिलाफ अपने हक की लड़ाई लड़ रही आला हजरत खानदान की बहू निदा खान ने मंगलवार को अदालत में पहली कामयाबी हासिल की। अपने शौहर शीरान रजा खां के विरुद्ध गुजारे के लिए दायर किए मुकदमे में अतिरिक्त पारिवारिक न्यायालय जज अजय सिंह ने निदा खान को दिए गए तलाक को अमान्य करार दिया। इसके साथ शीरान रजा को उन्हें गुजारा भत्ते के तौर पर 12 हजार रुपये प्रतिमाह देने का आदेश सुनाया।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि प्रतिवादी शीरान रजा के भाई इकान रजा खां ने अपनी गवाही के दौरान कहा है कि तलाकनामे पर उन्होंने दस्तखत नहीं किए हैं। तलाक के दौरान वह मौजूद भी नहीं थे। निदा ने भी तलाकनामे पर दस्तखत नहीं किए। अदालत ने कहा कि यह तलाक तीन तुअर काल में नहीं दिया गया यानी यह तलाक ‘तलाक उल सुन्नत’ न होकर ‘तलाक उल बिदअत’ है।

अदालत ने शीरान रजा का यह तर्क खारिज कर दिया कि वह मेहर और इद्दत के दौरान गुजारे भत्ते की रकम दे चुके हैं। अदालत ने कहा कि शीरान स्विफ्ट डिजायर कार रखते हैं। इससे उनकी आर्थिक हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। अदालत ने निदा खान को गुजारा भत्ते के तौर पर 12 हजार रुपये महीना देने का आदेश सुनाया। यह भी कहा कि यह रकम आवेदन की तारीख से ही दी जानी है जिसे पांच महीनों के अंदर अधिकतम पांच किस्तों में देना होगा।

जज ने कहा
‘तलाक उल बिदअत’ को लेकर समाज में न सिर्फ घोर विरोध है, बल्कि  इस पर संसद में भी कानून बनाने की कोशिश की जा रही है। तीन तलाक की वजह से मुस्लिम महिलाओं की हालत बद से बदतर होती जा रही है। मुस्लिम कानून के मुताबिक सिर्फ तलाक उल तफवीज के जरिए ही मुस्लिम औरतों को तलाक देने का अधिकार है। वे इस मामले में पुरुष पर ही निर्भर है। ऐसी हालत में उनके हितों का कानून से सरंक्षण किया जाना जरूरी है।

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