महाशिवरात्रि 2018: इन 10 मंदिरों में विराजते हैं देवों के देव महादेव, देंगे मुंह मांगा वरदान

Spread the love

महाशिवरात्रि के पावन पर्व से पहले अमर उजाला आपको ऐसे 10 मंदिरों के बारे में बताने जा रहा है। जहां महादेव साक्षात विराजते हैं। यहां पूजना और ध्यान करने से वरदान प्राप्त होता है।

केदारनाथ धाम: कहा जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने यहां तपस्या की और उसके बाद यही समाधि ली। हिंदू मान्यताओं में केदारनाथ धाम ऊर्जा का बहुत बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां पशुपतिनाथ का पिछला हिस्सा विराजमान है। कहा जाता है कि जब महाभारत के युद्ध जीतने पर परिवार के लोगों की हत्या से मुक्ति के लिए पांडवों ने शिव आराधना की, लेकिन भोलेनाथ पांडवों को आशीर्वाद नहीं देना चाहते थे। पांडव यहां पहुंचे तो भगवान शंकर ने बैल का रूप धारण कर लिया। भीम ने इनके पैर पकड़ने चाहे तो बैल रूप में शिव अंतर्ध्यान हो गए। तभी से नेपाल के पशुपतिनाथ में बैल के सिर और केदारनाथ में पृष्ठ भाग की पूजा होती है। इस मंदिर का दसवीं सदी में जीर्णोद्धार कराया गया। सदियों से आस्था और विश्वास के इस धाम में भक्ति की अलख यूं ही जगमगा रही है।

विश्वनाथ मंदिर : विश्वनाथ मंदिर उत्तरकाशी के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है तथा बस स्टैंड के पास ही स्थित है।यह मंदिर हिंदूओं के देव शिव को समर्पित है, तथा भक्त यहां मंत्रों का सस्वर पाठ हर समय सुन सकते हैं। यह मंदिर राजा ज्ञानेश्वर द्वारा बनाया गया था, जबकि भगवान शिव का त्रिशूल गूह द्वारा बनवाया गया था। इस त्रिशूल की लम्बाई 8 फुट और 9 इंच तथा इसकी ऊंचाई लगभग 26 फुट है। एक अन्य लोकप्रिय धार्मिक स्थल, शक्ति मंदिर (को समर्पित हिंदू देवी सती), विश्वनाथ मंदिर के सामने स्थित है।

जागेश्वर धाम : देवभूमि उत्तराखंड के इस ऐतिहासिक और प्राचीनतम मंदिर से दुनिया में शिवलिंग के पूजन की शुरुआत हुई।  अल्मोडा जिले के मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर देवदार के वृक्षों के घने जंगलों के बीच पहाडी पर स्थित जागेश्वर महादेव के मंदिर परिसर में पार्वती, हनुमान, मृत्युंजय महादेव, भैरव, केदारनाथ, दुर्गा सहित कुल 124 मंदिर स्थित हैं जिनमें पूजा होती है।भारतीय पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर को देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक बताया है। इसके लिए मंदिर परिसर में घोषणा करता एक शिलापट्ट भी लगाया गया है। एक सचाई यह भी है कि इसी मंदिर से ही भगवान शिव की लिंग पूजा के रूप में शुरूआत हुई थी। यहां की पूजा के बाद ही पूरी दुनियां में शिवलिंग की पूजा की जाने लगी और कई स्वयं निर्मित शिवलिंगों को बाद में ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाने लगा। इसका जिक्र शिवपुराण के मानस खण्ड में हुआ है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत यात्रा के दौरान यहां की यात्रा की थी और उसने इस मंदिर की प्राचीनता के बारे में जिक्र भी किया है। बताया गया कि जागेश्वर को ही नागेश्वर माना जाता है क्योंकि इस मंदिर के आसपास के अधिकांश इलाकों का नाम नाग पर ही आधारित हैं।

ताड़केश्वर धाम : गढ़वाल के प्राचीन शिवमदिरों में ताड़केश्चर महादेव का अति महत्व है। पौड़ी जनपद के जयहरीखाल विकासखण्ड के अन्तर्गत लैन्सडौन डेरियाखाल – रिखणीखाल मार्ग पर स्थित चखुलाखाल नामक गांव से लगभग 4 किमी० की दूरी पर समुद्रतल से लगभग 6000 फीट की ऊंचाई पर पर्वत श्रृखंलाओं के मध्य एक अत्यन्त रमणीक, शांत एवं पवित्र स्थान पर अवस्थित है। सघन गगनचुम्बी पवित्र देवदार के 5 किमी० फैले जंगल के मध्य में स्थित यह ताड़केश्वर धाम अध्यात्मिक चेतना, धर्मपरायणता व सहिष्णुता का उत्कृष्ट आस्था केन्द्र है। महाकवि कालिदास ने अपनी रचना रघुवंश खण्डकाव्य के द्वितीय चरण में श्री ताड़केश्वर धाम का बड़ा मनमोहक वर्णन किया है। हिन्दू धर्मग्रन्थ रामायण में ताड़केश्वर धाम का वर्णन एक दिव्य एवमं पावन आश्रम के रूप में किया है। कहा जात है कि ताड़कासुर का वध करने के बाद भगवान शिव ने यहां विश्राम किया था, विश्राम के समय उन्हें सूर्य की किरणों की गर्मी से बचाने के लिये मां पार्वती ने देवदार के सात वृक्ष लगाये थे। आज भी ये सातों वृक्ष मन्दिर के अहाते में हैं।

नीलकंठ महादेव : ऋषिकेश के पास मणिकूट पर्वत पर नीलकंठ महादेव मंदिर स्थित है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकला विष शिव ने इसी स्थान पर पिया था। विष पीने के बाद उनका गला नीला पड़ गया, इसलिए उन्हें नीलकंठ कहा गया। ऋषिकेश को हिमालय का प्रवेशद्वार कहा जाता है। नीलकंठ महादेव उत्तर भारत के मुख्य शिवमंदिरों में से एक है। मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने जब विष ग्रहण किया था तो उसी समय पार्वती ने उनका गला दबाया, ताकि विष उनके पेट तक न पहुंच सके। इस तरह विष उनके गले में बना रहा। विषपान के बाद विष के प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया था। गला नीला पड़ने के कारण ही भगवान शिव को नीलकंठ नाम से जाना गया। मंदिर के समीप पानी का झरना भी है, जहां श्रद्धालु मंदिर के दर्शन करने से पहले स्नान करते हैं।

गोपीनाथ मंदिर: गोपीनाथ मंदिर उत्तराखण्ड के चमोली क्षेत्र के गोपेश्वर नामक शहर में स्थित एक प्राचीन हिन्दू मंदिर है । भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भारत के प्रमुख रमणीय स्थलों मे से एक है । गोपीनाथ मंदिर कत्युरी शासकों द्वारा 9 वीं और 11 वीं शताब्दी के बीच बनाया गया था । गोपीनाथ मंदिर एक अद्भुत गुंबद और एक पवित्र स्थान है , जिसमें 24 दरवाजे हैं । मुख्य अभयारण्य के अंदर, एक स्वयंभू या आत्म-प्रकट शिव लिंग जिसे गोपीनाथ और नंदी के नाम से देखा जा सकता है । मंदिर परिसर में आंशिक रूप से टूटी हुई मूर्तियां अन्य मंदिरों के अस्तित्व को दर्शाती हैं । मुख्य मंदिर का निर्माण नगरा पैटर्न में किया गया है । इस पवित्र स्थल के दर्शन मात्र से ही भक्त अपने को धन्य मानते हैं एवं भगवान सारे भक्तों के समस्त कष्ट दूर कर देते हैं , गोपीनाथ मंदिर , केदारनाथ मंदिर के बाद सबसे प्राचीन मंदिरों की श्रेणी में आता है |

तुंगनाथ मंदिर: भगवान भोलेनाथ का ऐसा मंदिर जहां रास्ते में श्रद्घालुओं को गणेश मिलते हैं, गणेश पूरे रास्तेभर उनकी रक्षा करते हैं, ताकि मंदिर तक पहुंचने में कोई विघ्न न हो। हम बात कर रहे हैं, भारत के उतराखंड राज्य में तुंगनाथ मंदिर की। तुंगनाथ मंदिर के विषय में एक प्राचीन पौराणिक कथा प्रचलित है। कथा महाभारत के मुख्य पात्रों से संबन्धित है। कथा के अनुसार जब पांच पांडवों पर अपने परिवार के भाईयों की हत्या का आरोप लगा। अपने भाईयों की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए पांडवों ने इन स्थानों में प्रत्येक मंदिर में पांच केदार का निर्माण किया। तुंगनाथ मंदिर को चोटियों का स्वामी कहा जाता है। इस मंदिर के विषय से जुड़ी एक मान्यता प्रसिद्ध है। कि यहां पर शिव के ह्रदय और बाहों की पूजा होती है। इस मंदिर की पूजा का दायित्व यहीं के एक स्थानीय व्यक्ति को दिया जाता है। इस मंदिर में तीर्थयात्री हजारों की संख्या में प्रत्येक वर्ष पहुंचते है। इस स्थान से एक अन्य कथा जुडी हुई है, कि भगवान राम से रावण का वध करने के बद ब्रह्महत्या शाप से मुक्ति पाने के लिये उन्होंने यहां पर शिव की तपस्या की थी। तभी से इस स्थान का नाम चंद्रशिला भी प्रसिद्ध है।

रुद्रनाथ मंदिर: रुद्रनाथ मंदिर भगवान शिव जी को समर्पित धार्मिक स्थल है, जो पंचकेदारों में से एक केदार कहलाता है। समुद्रतल से 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रुद्रनाथ मंदिर भव्य प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण है। इस मंदिर की सबसे दिलचस्प बात यह है कि, इस मंदिर में भगवान शिव जी के एकानन, यानि कि मुख की पूजा होती है। इनके अन्य, बाकि बचे सम्पूर्ण शरीर की पूजा भारत के पड़ोसी देश नेपाल की राजधानी काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर में की जाती है। आपने भारत के कई ऐसे मंदिरों के दर्शन किये होंगे, जो भगवान शिव जी को समर्पित हैं, और वहां उनके लिंग की पूजा की जाती है। पर केवल उनके मुख की पूजा, शायद ही कहीं की जाती है और मंदिर से जुड़ा यही अद्वितीय तथ्य इस मंदिर को सबसे अलग और रोचक बनाता है। यहाँ पूजे जाने वाले शिव जी के मुख को ‘नीलकंठ महादेव’ कहते हैं।

मदमहेश्वर मंदिर: मद्महेश्वर मंदिर, मद्महेश्वर नदी के स्रोत (मुख) के पास के इलाके में स्थित है।  समुद्र तल से 3289 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर को दूसरे केदार के रूप में जाना जाता है।  किंवदंतियों के अनुसार, जब भगवान शिव खुद को पांडवों से छिपाना चाहते थे, तब बचने के लिए उन्होंने स्वयं को केदारनाथ में दफन कर लिया, बाद में उनका शरीर यहाँ मद्महेश्वर में दिखाई पड़ा।  यह मंदिर सर्दियों के मौसम में बंद रहता है।  इस मंदिर की रजत मूर्तियों को उखीमठ में स्थानांतरित कर दिया जाता है।  यह जगह भी पास के पर्यटन आकर्षणों जैसे काली मंदिर, केदारनाथ, सरस्वती कुण्ड, चौखम्बा और नीलकंठ की चोटियों की यात्रा का अवसर प्रदान करती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *